Skip to content
SarvaKosh
१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 36 of 505

Read in context
Page 36

३६ ईशावास्योपनिषद्
जिस स्थिति में (व्यक्ति) यह (मर्म) जान लेता है कि यह आत्म तत्त्व ही समस्त भूतों के रूप
में प्रकट हुआ है, (तो) उस एकत्व की अनुभूति की स्थिति में मोह अथवा शोक कहाँ टिक सकते
हैं ? अर्थात् ऐसी स्थिति में व्यक्ति मोह एवं शोक से परे हो जाता है ॥ ७॥
स पर्यगाच्छुक्रमकायमव्रणमस्त्राविरः शुद्धमपापविद्धम्। कविर्मनीषी
परिभूः स्वयंभूर्याथातथ्यतोऽर्थान्व्यदधाच्छाश्वतीभ्यः समाभ्यः ॥ ८ ॥
वह (परमात्मा) सर्वव्यापी है, तेजस्वी है । वह देहरहित, स्नायुरहित एवं छिद्र (वर्ण) रहित है ।
वह शुद्ध और निष्पाप है । वह कवि (क्रान्तदर्शी), मनीषी (मन पर शासन करने वाला), सर्वजयी और
स्वयं ही उत्पन्न होने वाला है । उसने अनादि काल से ही सबके लिए यथायोग्य अर्थों (साधनों) की
व्यवस्था बनायी है ॥ ८ ॥
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽविद्यामुपासते।
ततो भूय इव ते तमो य उ विद्यायाग्ँ रताः ॥ ९ ॥
जो केवल अविद्या (पदार्थपरक विद्या) की उपासना करते हैं, वे घोर अन्धकार में घिर जाते हैं और जो केवल
विद्या (चेतनापरक विद्या) की ही उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार के अन्धकार में फँस जाते हैं ॥ ९ ॥
अन्यदेवाहुर्विद्यायान्यदाहुरविद्यया ।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १० ॥
जिन देवपुरुषों ने हमारे लिए (इन विषयों को) विशेष रूप से कहा है, हमने उन धीर पुरुषों
से सुना है कि विद्या (आध्यात्मिक ज्ञान) का प्रभाव भिन्न है तथा अविद्या (भौतिक ज्ञान) का प्रभाव
उससे भिन्न है ॥ १० ॥
विद्यां चाविद्यां च यस्तद्वेदोभयग्ँ सह ।
अविद्यया मृत्युं तीर्त्वा विद्ययामृतमश्नुते ॥ ११ ॥
(अतएव) विद्या और अविद्या- इन दोनों को एक साथ जानो। (इनमें से) अविद्या द्वारा मृत्यु को पार
करके विद्या द्वारा अमरत्व की प्राप्ति की जा सकती है ॥ ११ ॥
अन्धं तमः प्रविशन्ति येऽसंभूतिमुपासते ।
ततो भूय इव ते तमो य उ संभूत्याग्ँरताः ॥ १२ ॥
जो लोग केवल 'असम्भूति' (बिखराव-विनाश) की उपासना करते हैं (उन्हीं प्रवृत्तियों में रमे
रहते हैं), वे घोर अन्धकार (अज्ञान) में घिर जाते हैं और जो केवल सम्भूति (संगठन-सृजन) की
ही उपासना करते हैं, वे भी उसी प्रकार के अंधकार में फँस जाते हैं ॥ १२ ॥
अन्यदेवाहुः संभवादन्यदाहुरसंभवात्।
इति शुश्रुम धीराणां ये नस्तद्विचचक्षिरे ॥ १३ ॥
जिन देवपुरुषों ने हमारे लिए (इन विषयों को) विशेष रूप से कहा है, हमने उन धीर पुरुषों से सुना
है कि सम्भूति योग का प्रभाव भिन्न है तथा असम्भूति योग का प्रभाव उससे भिन्न है ॥ १३ ॥
संभूतिं च विनाशं च यस्तद्वेदोभयग्ँ सह ।
विनाशेन मृत्युं तीर्त्वा संभूत्याऽमृतमश्नुते ॥ १४॥