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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

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DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 352 of 505

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Page 352

३५२ बृहदारण्यकोपनिषद्
यदि पुरुष यह आकांक्षा करे कि उसकी पत्नी गर्भ धारण करे, तो पूर्ववत् क्रिया करके पहले अपानन,
फिर अभिप्राणन प्रक्रिया सम्पन्न करे। संकल्प करे- 'मैं' अपनी इन्द्रिय के रेतस् (वीर्य या ओज) को तेरे
रेतस् में स्थापित करता हूँ। ऐसा करने से गर्भ स्थिर हो ही जाता है॥ ११ ॥
[ गर्भ न ठहरने के क्रम में पहले प्राणन और फिर अपानन तथा गर्भ ठहराने के लिए पहले अपानन, फिर
प्राणन क्रिया के निर्देश हैं। इसका अभ्यास संभवतः गुरु करा देते रहे होंगे।]
अथ यस्य जायायै जारः स्यात्तं चेद् द्विष्यादामपात्रेऽग्निमुपसमाधाय प्रतिलोमग्
शरबर्हिस्तीर्त्वा तस्मिन्नेताः शरभृष्टीः प्रतिलोमाः सर्पिषाक्ता जुहुयान्मम समिद्धेऽहौषीः
प्राणापानौ त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीः पुत्रपशूग्स्त आददेऽसाविति मम
समिद्धेऽहौषीरिष्टासुकृते त आददेऽसाविति मम समिद्धेऽहौषीराशापराकाशौ त
आददेऽसाविति । स वा एष निरिन्द्रियो विसुकृतोऽस्माल्लोकात्प्रैति यमेवंविद्ब्राह्मणः
शपति तस्मादेवंविच्छ्रोत्रियस्य दारेण नोपहासमिच्छेदुत ह्येवंवित्परो भवति ॥ १२ ॥
यदि किसी को अपनी नारी के प्रति किसी अन्य पुरुष के अवैध सम्बन्ध होने की शंका हो और वह
उस पुरुष को दण्ड देना चाहे, तो कच्चे मिट्टी के पात्र में अग्नि रखे और उसमें उल्टी तरफ तिर्यक् (तिरछे)
सरकंडों का बर्हिष् बिछाये, इसके पश्चात् बाणों के आकार की सींकें घृत में भिगोकर चार आहुतियाँ प्रदान
करे। प्रत्येक आहुति देते समय उसका नाम लेकर कहे- हे दुष्ट पुरुष ! तुमने मेरी जलती हुई अग्नि में आहुति
दी है, अतः मैं तेरे प्राण और अपान को खींचता हूँ। मैं तेरे पुत्र, पशु, पुण्य, आशा और पराकाशा (प्रत्याशा)
को भी ग्रहण करता हूँ। इस अभिचार कृत्य को जानने वाला विद्वान् ब्राह्मण जिस (परस्त्रीगामी) को शाप देता
है, उसकी शक्ति क्षीण हो जाती है और वह पुण्य हीन होकर परलोकवासी हो जाता है। अतः किसी ब्रह्मनिष्ठ
(की पत्नी) के प्रति इस प्रकार का निकृष्ट (परस्त्री गमन का) भाव कभी मन में भी नहीं लाना चाहिए ॥१२॥
अथ यस्य जायामार्तवं विन्देत्त्र्यहं कग्सेन पिबेदहतवासा नैनां वृषलो न
वृषल्युपहन्यात्त्रिरात्रान्त आप्लुत्य व्रीहीनवघातयेत् ॥ १३ ॥
जब स्त्री रजस्वला हो अर्थात् जब ऋतुकाल प्राप्त हो, तब उसे तीन दिन तक काँसे के पात्र में नहीं
खाना चाहिए। चतुर्थ दिन स्नान के पश्चात् साफ-सुथरा और ऐसा वस्त्र धारण करना चाहिए, जो फटा न हो।
उस स्त्री को कोई धर्महीन पुरुष (अथवा स्त्री) स्पर्श न करे। तीन रात्रियाँ बीत जाने पर उस स्त्री को धान
कूटने (जैसे श्रम वाले काम) में लगाया जाना उचित है ॥ १३ ॥
[ रजस्वला काल में स्त्री को अधिक शीत-उष्ण तथा श्रम से बचना चाहिए, ताकि मासिक परिशोधन क्रम
में काय-ऊर्जा भली प्रकार लग सके। आहार - विहार का संयम भी बरता जाता है। तीन दिन बाद पुनः सामान्य
जीवन क्रम प्रारंभ किया जाना उचित है।]
स य इच्छेत्पुत्रो मे शुक्लो जायेत वेदमनुब्रुवीत सर्वमायुरियादिति क्षीरौदनं पाचयित्वा
सर्पिष्मन्तमश्नीयातामीश्वरौ जनयितवै ॥ १४ ॥
जो दम्पती यह चाहते हों कि उन्हें गौरवर्ण, एक वेद के ज्ञाता और शतायु पुत्र की प्राप्ति हो, वे दूध और चावल
की खीर पकाकर उसमें घृत मिला कर सेवन करें। इससे वे वैसे पुत्र को प्राप्त करने में समर्थ होते हैं॥ १४॥