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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

Page 347 of 505

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Page 347

अध्याय ६ ब्राह्मण ३ मन्त्र ६ ३४७
इसके पश्चात् जो मन्थ (मिश्रित द्रव्य) और संस्रव (टपकाया हुआ घृत) पात्र में रखा है, उसे स्पर्श
करते हुए 'भ्रमदसि' 'ज्वलदसि' इत्यादि मन्त्र बोलता हुआ कहता है कि आप (प्राणस्वरूप होने के कारण
सर्वत्र) भ्रमणशील हैं, (अग्निरूप होने से) जाज्वल्यमान हैं, (ब्रह्मरूप होने से) पूर्ण हैं, (आकाश रूप
होने से) स्तब्ध हैं, (सबके मित्र होने के कारण) जगद्रूप एक सभा तुल्य हैं। आप ही हिङ्कृत और
हिङ्क्रियमाण हैं। आप ही उदगीथ और उद्गीयमान हैं। आप ही श्रावित और प्रत्याश्रावित हैं अर्थात्
आपको ही अध्वर्यु और आग्नीध्र अभिषुत करते हैं, आप ही मेघ में सम्यक् प्रकार से (विद्युत् रूप में)
प्रदीप्त हैं। आप ही विभु (विभिन्न रूपों वाले) और प्रभु (समर्थ) हैं। आप ही अन्न, ज्योति और मृत्यु हैं।
आप ही सबके संहारक होने से स्वयं प्रलय स्वरूप हैं॥४॥
अथैनमुद्यच्छत्यामँस्यामं हि ते महि स हि राजेशानोऽधिपतिः स माँ राजेशानो-
ऽधिपतिं करोत्विति ॥ ५॥
इसके पश्चात् मन्थ को पात्र सहित हाथ से उठाता हुआ- 'आमंसि आमंहि' आदि मन्त्रों का उच्चारण
करे। कहे- आप सर्वज्ञ हैं, हम आपकी महिमा को भली-भाँति जानते हैं, आप (प्राण) ही राजा, ईशान
और अधिपति हैं, हमें भी आप राजा, ईशान और अधिपति बनाएँ॥५॥
अथैनमाचामति तत्सवितुर्वरेण्यं मधु वाता ऋतायते मधु क्षरन्ति सिन्धवः माध्वीर्नः
सन्त्वोषधीर्भूः स्वाहा भर्गो देवस्य धीमहि मधु नक्तमुतोषसो मधुमत्पार्थिवँरजः मधु
द्यौरस्तु नः पिता भुवः स्वाहा धियो यो नः प्रयोदयान्मधुमान्नो वनस्पतिर्मधुमाँ ३ अस्तु
सूर्यः माध्वीर्गावो भवन्तु नः स्वः स्वाहेति सर्वां च सावित्रीमान्वाह सर्वांश्च मधुमतीरहमेवेदँ
सर्वं भूयासं भूर्भुवः स्वः स्वाहेत्यन्तत आचम्य पाणी प्रक्षाल्य जघनेनाग्निं प्राक्शिराः
संविशति प्रातरादित्यमुपतिष्ठते दिशामेकपुण्डरीकमस्यहं मनुष्याणामेकपुण्डरीकं
भूयासमिति यथेतमेत्य जघनेनाग्निमासीनो वँशं जपति ॥ ६ ॥
इसके बाद उस मन्थ को चार ग्रासों में मन्त्रों के साथ भक्षण करे। पहले 'तत्सवितुर्वरेण्यं' आदि प्रथम
मन्त्र का उच्चारण करे, जिसका अर्थ है-सविता के उस वरेण्य (वरण करने योग्य) पद का मैं ध्यान करता
हूँ। 'मधुवाता ऋतायते'- वायु मधुर होकर बह रही है। 'मधुक्षरन्ति सिन्धवः' - नदियाँ मधु रस प्रवाहित
कर रही हैं। 'माध्वीर्नः सन्त्वोषधीः'- ओषधियाँ हमारे लिए मधुर हों। इसके पश्चात् 'भूःस्वाहा' कहकर
मन्थ का प्रथम ग्रास ग्रहण करे। इसके उपरान्त- 'भर्गो देवस्य धीमहि' - हम सविता के पापनाशक दिव्य
तेज को धारण करते हैं। 'मधुनक्तमुतोषसो'-रात्रि और दिवस मधुर हों। 'मधुमत्पार्थिवँरजः'-पृथिवी के
रजकण मधुर हों। 'मधु द्यौरस्तु नः पिता,'-पिता द्युलोक हमारे लिए मधुर हों। इतना बोलकर 'भुवः
स्वाहा' मन्त्र के साथ मन्थ का द्वितीय ग्रास ग्रहण करे। तब- 'धियो यो नः प्रचोदयात्'- वे सविता देवता
हमारी बुद्धि को सन्मार्ग में प्रेरित करें। 'मधु मान्नो वनस्पतिः' वनस्पति हमारे निमित्त (सोम मय) हो।
'मधुमाँर अस्तु सूर्यः'- सूर्य हमारे लिए मधुर हो। 'माध्वीर्गावो भवन्तु नः'- गौएँ मधुर दुग्ध प्रदात्री हों।
'स्वः स्वाहा'- उच्चारण करके मन्थ का तृतीय ग्रास भक्षण करे। इसके पश्चात् सम्पूर्ण सावित्री मन्त्र का