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१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)

108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand

by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य

Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)

DevanagariSanskritpublished505 pages

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अध्याय ६ ब्राह्मण २ मन्त्र २ ३४१
उस वागिन्द्रिय ने कहा- मुझमें जो श्रेष्ठता है, अब तुम ही उस वसिष्ठ गुण से सम्पन्न हो। ऐसे ही नेत्र
ने भी कहा- मैं जो प्रतिष्ठा रूप हूँ, अब तुम ही उस प्रतिष्ठा के गुण से सम्पन्न हो। श्रोत्र ने भी कहा- मैं जो
सम्पदा रूप हूँ, अब तुम ही उस सम्पदा के गुण से युक्त हो। (तत्पश्चात्) मन ने कहा- मैं जो आश्रय रूप
हूँ, अब तुम ही उस आश्रय के गुणों से सम्पन्न हो। (तदनन्तर) रेतस् ने कहा- मैं जो सन्तानोत्पत्ति कर्त्ता
हूँ, अब तुम ही उस प्रजा की उत्पत्ति के गुणों से सम्पन्न हो। (इसके बाद) प्राण ने प्रश्न किया कि मेरा अन्न
और वस्त्र क्या होगा ? तब उन वाक् आदि इन्द्रियों ने कहा- कीट-पतंगादि से लेकर जितने देहधारी हैं, वे
सब तुम्हारे अन्न होंगे और जल ही तुम्हारा उपवीत होगा। प्राण के इस अन्न को इस तरह से जानने वाले का
भक्षित अन्न अभक्ष्य नहीं होता। जल को वस्त्र रूप में जानने वाले मनीषिगण जल का आचमन करके ही
भोजन ग्रहण करते हैं। प्राण को वस्त्र से रहित नहीं होने देते ॥ १४॥
॥ द्वितीयं ब्राह्मणम् ॥
श्वेतकेतुर्ह वा आरुणेयः पञ्चालानां परिषदमाजगाम स आजगाम जैविलं प्रवाहणं
परिचारयमाणं तमुदीक्ष्याभ्युवाद कुमार३ इति स भो३ इति प्रतिशुश्रावानुशिष्टोऽन्वसि
पित्रत्योमिति होवाच ॥ १ ॥
आरुणि का पुत्र श्वेतकेतु पांचालों की सभा में पहुँचकर सेवकों द्वारा परिचर्या कराते हुए जीवल के
पुत्र प्रवाहण के समीप आया। श्वेतकेतु को देखकर प्रवाहण ने 'ओ कुमार!' कहते हुए बुलाया। वह बोला-
'भो !' (क्या हैं?)। प्रवाहण ने प्रश्न किया-क्या तुम्हारे पिता ने तुम्हें शिक्षा दी है ? श्वेतकेतु ने कहा- 'हाँ' ॥
वेत्थ यथेमाः प्रजाः प्रयत्यो विप्रतिपद्यन्ता ३ इति नेति होवाच वेत्थो यथेमं लोकं
पुनरापद्यन्ता३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो यथासौ लोक एवं बहुभिः पुनः पुनः प्रयद्भिर्न
संपूर्यता३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो यतिथ्यामाहुत्याः हुतायामापः पुरुषवाचो भूत्वा
समुत्थाय वदन्ती३ इति नेति हैवोवाच वेत्थो देवयानस्य वा पथः प्रतिपदं पितृयाणस्य
वा यत्कृत्वा देवयानं वा पन्थानं प्रतिपद्यन्ते पितृयाणं वापि हि ऋषेर्वचः श्रुतम् द्वे सृती
अशृणवं पितॄणामहं देवानामुत मर्त्यानाम् । ताभ्यामिदं विश्वमेजत्समेति यदन्तरा पितरं
मातरं चेति नाहमत एकंचन वेदेति होवाच ॥ २ ॥
(प्रवाहण ने पूछा-) प्रजा (जीवात्मा) शरीर को त्यागने के पश्चात् भिन्न-भिन्न मार्गों से गमन करती
है, क्या तुम यह जानते हो? श्वेतकेतु ने उत्तर दिया- 'नहीं' । (राजा ने पुनः प्रश्न किया-) वह पुनः इस
लोक में आती है, तो क्या यह तुम्हें ज्ञात है ? श्वेतकेतु ने फिर कहा 'नहीं'। (राजा ने फिर प्रश्न किया-)
इस तरह असंख्यों मरकर गये हुए प्राणियों के गमन करने से वह लोक भरता क्यों नहीं ? उसने उत्तर दिया
'नहीं जानता।' (राजा ने फिर पूछा-) कौन सी आहुति प्रदान करने से आपः तत्त्व ही प्राणी रूप में होकर
उठने एवं बोलने में समर्थ हो जाता है ? उसने उत्तर दिया- नहीं जानता। (प्रश्न पूछा गया-) देवयान मार्ग
का कर्मरूपी साधन अथवा पितृयान का कर्मरूपी साधन कैसे प्राप्त होता है ? क्या तुमने ऋषियों की यह
वाणी सुनी है कि पितरों एवं देवताओं के इस प्रकार के दो मार्ग हैं। ये दोनों मार्ग मनुष्य से सम्बन्ध रखने