१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
Page 339 of 505
Read in contextअध्याय ६ ब्राह्मण १ मन्त्र १० ३३१
जो व्यक्ति प्रजापति (प्रजनन सामर्थ्य) को जानता है, वह प्रजा और पशुओं के रूप में प्रजात अर्थात् वृद्धि को
प्राप्त करता है। रेतस् ही प्रजापति है, जो इस प्रकार से जानता है, वह प्रजा एवं पशुओं से युक्त होता है ॥६॥
ते हेमे प्राणा अहᳵश्रेयसे विवदमाना ब्रह्म जग्मुस्तद्धोचुः को नो वसिष्ठ इति तद्धोवाच
यस्मिन्व उत्क्रान्त इदᳵ शरीरं पापीयो मन्यते स वो वसिष्ठ इति ॥ ७॥
वागादि समस्त प्राण 'मैं श्रेष्ठ हूँ, मैं श्रेष्ठ हूँ', इस प्रकार प्रजापति ब्रह्मा जी के पास पहुँच कर पूछने
लगे कि हममें से कौन वरिष्ठ (श्रेष्ठ) है ? प्रजापति ने कहा- तुममें से जिसके बाहर निकल जाने पर यह
शरीर अधिक पापी अर्थात् अपवित्र माना जाता है, वही तुममें से श्रेष्ठ है ॥ ७ ॥
वाग्धोच्चक्राम सा संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते
होचुर्यथाकला अवदन्तो वाचा प्राणन्तः प्राणेन पश्यन्तश्चक्षुषा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाᳵसो
मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्वेति प्रविवेश ह वाक् ॥८॥
सर्वप्रथम वाणी ने शरीर को छोड़ दिया। उस (वागिन्द्रिय) ने एक वर्ष तक बाहर रहने के पश्चात्
वापस आकर पूछा- मेरे अभाव में तुम सब कैसे जीवित रहे ? यह सुनकर उन्होंने कहा- जिस प्रकार मूक
व्यक्ति वाणी से न बोलते हुए भी प्राण से श्वसन क्रिया सम्पन्न करते, चक्षु से देखते, कान से श्रवण करते
हैं, मन से जानते हैं और रेतस् (वीर्य) से प्रजा की वृद्धि करते हैं (जीवित रहते हैं), उसी प्रकार हम भी
जीवित रहे। ऐसा श्रवण कर वागिन्द्रिय ने शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥८॥
चक्षुर्होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते
होचुर्यथा अन्धा अपश्यन्तश्चक्षुषा प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा शृण्वन्तः श्रोत्रेण विद्वाᳵसो
मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्वेति प्रविवेश ह चक्षुः ॥९॥
(वाणी के पश्चात्) चक्षु एक वर्ष के लिए शरीर से बाहर चले गये। एक वर्ष के अनन्तर लौटे और
बोले-'तुम मेरे बिना किस प्रकार जीवित रह सके'? उन्होंने कहा- जैसे अन्धे व्यक्ति नेत्र से न देखते हुए
भी प्राण से प्राणन क्रिया सम्पन्न करते, वागिन्द्रिय से बोलते, श्रोत्र से श्रवण करते, मन से मनन करते और
रेतस् से प्रजा (सन्तान) की उत्पत्ति करते हुए जीवित रहते हैं, उसी तरह हम भी जीवित रहे। नेत्रों ने इस
प्रकार सुनते हुए शरीर में पुनः प्रवेश किया ॥ ९॥
श्रोत्रᳵ होच्चक्राम तत्संवत्सरं प्रोष्यागत्योवाच कथमशकत मदृते जीवितुमिति ते
होचुर्यथा बधिरा अशृण्वन्तः श्रोत्रेण प्राणन्तः प्राणेन वदन्तो वाचा पश्यन्तश्चक्षुषा विद्वाᳵसो
मनसा प्रजायमाना रेतसैवमजीविष्वेति प्रविवेश ह श्रोत्रम् ॥ १०॥
चक्षु के उपरान्त श्रोत्र ने उत्क्रमण किया। उसने भी एक वर्ष तक शरीर से बाहर रहते हुए, वापस
आकर वागादि अन्य इन्द्रियों से पूछा- तुम सब मेरे बिना कैसे जीवन धारण किये रहे ? तब उन समस्त
इन्द्रियों ने कहा- 'जिस प्रकार बधिर व्यक्ति कानों से श्रवण न करते हुए भी प्राण से श्वास लेते हुए, वाणी
से बोलते हुए, नेत्र से देखते हुए, मन से जानते हुए और रेतस् से सन्तान की उत्पत्ति करते हुए जीवन धारण
किए रहते हैं, उसी प्रकार हम भी जीवित रहे'। यह सुनकर श्रोत्र ने पुनः शरीर में प्रवेश किया ॥ १० ॥