१०८ उपनिषद् (ज्ञान खण्ड - भाग २)
108 Upanishads Part 2 - Gyan Khand
by पण्डित श्रीराम शर्मा आचार्य
Source: संस्कृति संस्थान बरेली · संस्कृति संस्थान बरेली (origin)
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Read in context१४६ छान्दोग्योपनिषद्
॥ पञ्चमः खण्डः ॥
पर्जन्यो वाव गौतमाग्निस्तस्य वायुरेव समिदभ्रं धूमो विद्युदर्चिरशनिरङ्गारा ह्रादुनयो
विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! (इस अग्नि विद्या के अन्तर्गत) पर्जन्य ही अग्नि है, वायु ही समिधायें हैं, बादल ही धूम्र है,
विद्युत् ही उसकी ज्वालाएँ हैं, वज्र (उसका) अङ्गार और गर्जन ही विस्फुलिंग अर्थात् चिनगारियाँ हैं ॥१॥
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः सोमꣳ राजानं जुह्वति तस्या आहुतेर्वर्षꣳ संभवति ॥ २ ॥
इस दिव्याग्नि में ही देवगण सामूहिक रूप से राजा सोम के निमित्त यजन करते हैं, उस विशेषाहुति
से वर्षा का प्राकट्य होता है ॥ २ ॥
[ पर्जन्य उस लोक की उत्पादक क्षमता है। यजन के दूसरे चरण में सोम से वर्षा की उत्पत्ति होती है। ]
॥ षष्ठः खण्डः ॥
पृथिवी वाव गौतमाग्निस्तस्याः संवत्सर एव समिदाकाशो धूमो रात्रिरर्चिर्दिशोऽङ्गारा
अवान्तरदिशो विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! (इस क्रम में) पृथिवी ही अग्नि है। संवत्सर ही उसकी समिधाएँ हैं, आकाश ही धूम्र (धुआँ) है,
रात्रि ही ज्वालाएँ हैं, दिशाएँ ही अङ्गारे और अवान्तर दिशाएँ अर्थात् कोने ही (विस्फुलिङ्ग) चिनगारियाँ हैं ॥ १ ॥
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा वर्षं जुह्वति तस्या आहुतेरन्नꣳ संभवति ॥ २ ॥
उस श्रेष्ठ दिव्याग्नि में समस्त देवता वर्षा के निमित्त दिव्य आहुतियाँ समर्पित करते हैं; उस विशेष
आहुति से अन्न का प्रादुर्भाव होता है ॥ २ ॥
[ यजन के तीसरे चरण में पृथिवी में दी गयी इस आहुति से जीवन तत्त्व अन्न के रूप में परिवर्तित हो जाता है।]
॥ सप्तमः खण्डः ॥
पुरुषो वाव गौतमाग्निस्तस्य वागेव समित्प्राणो धूमो जिह्वार्चिश्चक्षुरङ्गाराः श्रोत्रं
विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! पुरुष ही दिव्याग्नि है। उस (अग्नि विद्या) की वाक् ही समिधाएँ (ईंधन) हैं। प्राण ही धूम्र (धुआँ)
है। जिह्वा ही ज्वाला है, नेत्र अङ्गारे हैं तथा श्रोत्र (कान) ही विस्फुलिङ्ग अर्थात् चिनगारियाँ हैं ॥ १ ॥
तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवा अन्नं जुह्वति तस्या आहुते रेतः संभवति ॥ २ ॥
उस दिव्याग्नि में सभी देवता मिलकर अन्न के निमित्त आहुति समर्पित करते हैं, उस विशेष आहुति
से वीर्य अर्थात् पुरुषार्थ की उत्पत्ति होती है ॥ २ ॥
[ इस चौथे चरण की आहुति के बाद अन्तःस्थ जीवन तत्त्व वीर्य में पोषक तत्त्व ( आपः ) शुक्राणु रूप में
प्रकट हो जाता है।]
॥ अष्टमः खण्डः ॥
योषा वाव गौतमाग्निस्तस्या उपस्थ एव समिद्यदुपमन्त्रयते स धूमो योनिरर्चिर्यदन्तः
करोति तेऽङ्गारा अभिनन्दा विस्फुलिङ्गाः ॥ १ ॥
हे गौतम ! उस अग्नि विद्या की स्त्री ही दिव्याग्नि है। उसका उपस्थ (जननांग) ही समिधा अर्थात्